प्रेरणा

तुमको ही आना होगा कि उड़ने को पंख हम पर नहीं
हाँ सुना है उड़ने को सपने पर नहीं
पर उम्मीदों में सपने, क्या सच्चाई में सपनों की जगह कहीं
हमारे बगैर फर्क़ तुम्हें कुछ भी नहीं,
फ़र्क हमें की हम तुम्हारे बगैर कुछ भी नहीं

तुम भी वहीं, वो दूरियां भी वहीं, नजदीकियां भी वहीं
मगर हम नहीं वहां कहीं, हम यहां भी कहीं नहीं
नहीं कहीं अब उषाएं सुनहरी, जाने कहां शामें बही
बग़ैर रात अमावस अब सब दिन शाम भर हर कहीं
भंवरे भी नहीं भ्रमण पर, भोरें भी उदासी रही
वर्षा में अब सुगंध नहीं, सौगंध है ये अकेलेपन की
बस फंसे हैं, हिमझिंझावात से में कहीं
चारों ओर खेद का श्वेत है, ग़म में डूबने को अंधकार भी नहीं
बस बचे हैं, हम तुम्हारे कुछ आखिरी प्रेम के इश्तिहारों की जलती उष्मा में यहीं
कुरेद रहे आखिरी राख की खाक के बचे अंगारों में खुदी
पर उनमें भी हम नहीं, हम हैं कहाँ कुछ पता ही नहीं

देखा जब भी दिशा में तुम्हारी, दूर क्षितिज में कहीं घाम है सुनहरी
घेरे मृदु मंद सदल फेरे अनिल विमल, उल्लास है बिखेरी
वहीं कहीं करते हम कल्पना हैं हमारी
शायद हम को ही आना होगा तुम तक, चाहे हम पर पंख नहीं

Khule baalo se aakhri mulaqaat

तुम्हें बालों को बांधते हुए देखने का पूरी तरह से हक़ समझते हैं हम
तुम्हारे खुले बालों से आखिरी मुलाकात का सा रिश्ता जान पड़ता था |

Nazroo ke diwaane hai hum

कशिशों में तुम्हारे वक्ष के विपाटन का अंक दूसरा है नजरों में, पहले तो नजरों के दीवाने हैं हम
नजरें मिलाने की इजाजत भी मिलती होगी क्या कहीं,
जाने उन आँखों को रातें मिलती होंगी या नहीं
जो कभी देखो आंखें फिरा के तो जुबानें लगती होंगी मृत कवियों की लफ़्ज़ों में,
फिसलते हम भी कभी शामों में, ख्वाबों की लहरों में,
हमें आज तक मोहब्बत नहीं हुई चलो इस बात का ग़म हुआ खतम……. पहले तो नजरों के दीवाने हैं हम |

तुम्

मधुमास बनकर लौटी हैं हवाएं जो गुज़री थी तुम्हारी लंबी घटाओं से होकर
तुम्हारी गरजती बरसातों में भीगे कितनी उशाऐं खोकर
करीब आजाना तो गुफ़्तगू जैसे सितारों को छूकर

बातें करना तुमसे इन लम्हों में
तुम्हें छू भी लेना तो घुलना गज़लों में

हम तो मधुराऐं हैं उन अधरों पर
सारी कविताएं अधूरी जिन्हें महसूस ना करना भर
मगर होना कविताओं का भी तो नजराना है तुम्हारी नजरों पर
प्यार अलंकार असार झर-झर तुम्हारे कदमों पर ।

रंग शाम का और श्यामली झील

नील गगन की चंचलता में खेल रहे पयौद धवल,
उजियारी गुनगुनी घाम में
ऊपर बड़े खड़े, लाल हरे
प्रकृती से भरे
फाल्गुन की होली के न्योते।

कहीं एक संक्षिप्त स्वर सा
अमल कोमल
बसंती बयार संग मिल
पावन स्यामल झील पर पड़कर जल तरंग
गायों की घन्टियो से स्वरेक्य, रागो के झरोंके।

A pen portrait.

When the rain stopped

Broken dreams empty heart eyes sleep hungry
I put my alarm aside and thought of sleeping peacefully
turned off the lights, closed my eyes longed for a dream, hopefully
Fate smiled and I feel to sleep easily
then what happened I woke up at three
tried hard to sleep again for hour n’ a half, steadily
couldn’t, so decided to go for a walk early
Half a mile and my thoughts when it started raining heavily
Had nothing to loose, decided to enjoy the shower happily
And when it stopped raining, the morning was itself poetry

Time slowing down as the rain letting up,
early birds letting the world know thier rhymes
Leaves bowing down to the last of drops
pistil performing florescence in the deity of sunshine
Bark beatles started clicking in choir
suddenly the air felt ripe with dewy and pleasant petrichor
the untold story of lilac red got me mislead
it was a meet cute, the simple breeze and I collided

Everything feels a vacant lot usually
It was empty then but beautifully.